अनंत कोटी ब्रम्हाण्ड नायक राजाधिराज
योगिराज पारब्रम्ह श्री सच्चिदानंद
सद्गुरु साईनाथ महाराज  की जय

पेहले साई के चरणों में अपना शीश नमाऊं मैं
पेहले साई के चरणों में अपना शीश नमाऊं मैं
कैसे शिरडी साई आए सारा हाल सुनाऊं मैं
कौन है माता पिता कौन है ये न किसी ने भी जाना
कहां जन्म साई ने धारा प्रश्न पहेली रहा बना
कोई कहे अयोध्या के ये रामचंद्र भगवान हैं
कोई केहता साई बाबा पवन पुत्र हनुमान हैं
पवन पुत्र हनुमान हैं

कोई केहता मंगल मूर्ति श्री गजानंद हैं साई
श्री गजानंद हैं साई..श्री गजानंद हैं साई..
कोई केहता गोकुल मोहन देवकी नन्दन हैं साई
देवकी नन्दन हैं साई
शंकर समझे भक्त कई तो बाबा को भजते रहते
बाबा को भजते रहते..बाबा को भजते रहते..
कोई कह अवतार दत्त का पूजा साई की करते
पूजा साई की करते
कुछ भी मानो उनको तुम पर साई हैं सच्चे भगवान
बड़े दयालु दीनबन्धु है कितनों को दिया जीवन दान
कितनों को दिया जीवन दान

कई वर्ष पहले की घटना तुम्हें सुनाऊंगा मैं बात
किसी भाग्यशाली की शिरडी में आई थी बारात
आया साथ उसी के था बालक एक बहुत सुन्दर
आया आकर वहीं बस गया पावन शिरडी किया नगर
पावन शिरडी किया नगर
कई दिनों तक रहा भटकता भिक्षा माँगी उसने दर-दर
और दिखाई ऐसी लीला जग में जो हो गई अमर
जग में जो हो गई अमर

जैसे-जैसे उमर बढ़ी वैसे ही बढ़ती गई शान
घर-घर होने लगा नगर में साई बाबा का गुणगान
साई बाबा का गुणगान
दिग्-दिगन्त में लगा गूंजने फिर तो साईंजी का नाम
दीन-दुखी की रक्षा करना यही रहा बाबा का काम
यही रहा बाबा का काम
बाबा के चरणों में जाकर जो कहता मैं हूं निर्धन
दया उसी पर होती उनकी खुल जाते दुःख के बंधन
खुल जाते दुःख के बंधन

कभी किसी ने मांगी भिक्षा दो बाबा मुझको संतान
एवं अस्तु केहकर साई देते थे उसको वरदान
देते थे उसको वरदान
स्वयं दुःखी बाबा हो जाते दीन-दुःखी जन का रख हाल
अन्तःकरण श्री साई का सागर जैसा रहा विशाल
सागर जैसा रहा विशाल

भक्त एक मद्रासी आया घर का बहुत ब़ड़ा धनवान
माल खजाना बेहद उसका केवल नहीं रही संतान
लगा मनाने साईनाथ को बाबा मुझ पर दया करो
झंझा से झंकृत नैया को तुम्हीं मेरी पार करो
कुलदीपक के बिना अंधेरा छाया हुआ घर में मेरे
इसलिए आया हूँ बाबा होकर शरणागत तोरे

कुलदीपक के अभाव में व्यर्थ है दौलत की माया
आज भिखारी बनकर बाबा शरण तुम्हारी मैं आया
दे दो मुझको पुत्र-दान मैं ऋणी रहूंगा जीवन भर
और किसी की आशा न मुझको सिर्फ भरोसा है तुम पर
अनुनय-विनय बहुत की उसने चरणों में धर के शीश
तब प्रसन्न होकर बाबा ने दिया भक्त को यह आशीष

‘अल्ला भला करेगा तेरा’ पुत्र जन्म हो तेरे घर
क्रपा रहेगी तुझ पर उसकी और तेरे उस बालक पर
और तेरे उस बालक पर

अब तक नहीं किसी ने पाया साई की क्रीपा का पार
पुत्र रत्न दे मद्रासी को धन्य किया उसका संसार
तन-मन से जो भजे उसी का जग में होता है उद्धार
सांच को आंच नहीं हैं कोई सदा झूठ की होती हार
मैं हूं सदा सहारे उसके सदा रहूँगा उसका दास
साई जैसा प्रभु मिला है इतनी ही कम है क्या आस

मेरा भी दिन था एक ऐसा मिलती नहीं थी मुझे भी रोटी
तन पर कप़ड़ा दूर रहा था शेष रही नन्हीं सी लंगोटी
सरिता सन्मुख होने पर भी मैं प्यासा का प्यासा था
दुर्दिन मेरा मेरे ऊपर दावाग्नी बरसाता था
धरती के अतिरिक्त जगत में मेरा कुछ अवलम्ब न था
बना भिखारी मैं दुनिया में दर-दर ठोकर खाता था

ऐसे में एक मित्र मिला जो परम भक्त साई का था
जंजालों से मुक्त मगर इस जगती में मुज जैसा था
बाबा के दर्शन की खातिर मिल दोनों ने किया विचार
साई जैसे दया मूर्ति के दर्शन को हो गए तैयार
पावन शिरडी नगर में जाकर देखी मतवाली मूरति
धन्य जन्म हो गया कि हमने जब देखी साई की सूरत
जब से किए हैं दर्शन हमने दुःख सारा काफूर हो गया
संकट सारे मिटै और विपदाओं का अन्त हो गया
मान और सम्मान मिला भिक्षा में हमको बाबा से
प्रतिबिम्‍बित हो उठे जगत में हम साई की आभा से
बाबा ने सन्मान दिया है मान दिया इस जीवन में
इसका ही संबल ले मैं हंसता जाऊंगा जीवन में
हंसता जाऊंगा जीवन में

साई की लीला का मेरे मन पर ऐसा असर हुआ
लगता जगती के कण-कण में जैसे हो वह भरा हुआ
लगता जगती के कण-कण में जैसे हो वह भरा हुआ

‘काशीराम’ बाबा का भक्त शिरडी में रेहता था
मैं साई का साई मेरा वो दुनिया से केहता था
सी कर स्वयं वस्त्र बेचता ग्राम-नगर बाजारों में
झंकृत उसकी हृदय तंत्री थी साई की झंकारों से
साई की झंकारों से..साई की झंकारों से..

स्तब्ध निशा थी थे सोय रजनी आंचल में चाँद सितारे
नहीं सूझता रहा हाथ को हाथ तिमिर के मारे
वस्त्र बेचकर लौट रहा था हाय हाट से काशी
विचित्र ब़ड़ा संयोग कि उस दिन आता था एकाकी
घेर राह में ख़ड़े हो गए उसे कुटिल अन्यायी
मारो काटो लूटो इसकी ही ध्वनि प़ड़ी सुनाई
लूट पीटकर उसे वहाँ से कुटिल हो गए चम्पत
आघातों से मर्माहत हो उसने दी संज्ञा आखो
बहुत देर तक प़ड़ा रह वह वहाँ उसी हालत में
जाने कब कुछ होश हो उठा उसको किसी पलक में
अनजाने ही उसके मुंह से निकल प़ड़ा था साई
जिसकी प्रतिध्वनि शिरडी में बाबा को प़ड़ी सुनाई

क्षुब्ध उठा हो मानस उनका बाबा गए विकल हो
लगता जैसे घटना सारी घटी उन्हीं के सन्मुख हो
उन्मादी से इ़धर-उ़धर तब बाबा लेगे भटकने
सन्मुख चीजें जो भी आई उनको लगने पटकने
और धधकते अंगारों में बाबा ने कर डाला
हुए सशंकित सभी वहाँ लख ताण्डवनृत्य निराला

समझ गए सब लोग कि कोई भक्त प़ड़ा संकट में
क्षुभित ख़ड़े थे सभी वहाँ पर प़ड़े हुए विस्मय में
उसे बचाने की ही खातिर बाबा आज विकल है
उसकी ही पी़ड़ा से पीडित उनकी अन्तःस्थल है
इतने में ही विविध ने अपनी विचित्रता दिखलाई
देख कर जिसको जनता की श्रद्धा सरिता लेहराई
श्रद्धा सरिता लेहराई

लेकर संज्ञाहीन भक्त को गा़ड़ी एक वहाँ आई
सन्मुख अपने देख भक्त को साई की आंखें भर आई
शांत धीर गंभीर सिन्धु सा बाबा का अन्तःस्थल
आज न जाने क्यों रेह-रेहकर हो जाता था चंचल
आज दया की मूर्ति स्वयं था बना हुआ उपचारी
और भक्त के लिए आज था देव बना प्रतिहारी
आज भक्ति की विषम परीक्षा में सफल हुआ था काशी
उसके ही दर्शन की खातिर थे उम़ड़े नगर-निवासी
जब भी और जहां भी कोई भक्त प़ड़े संकट में
उसकी रक्षा करने बाबा जाते हैं पलभर में
युग-युग का है सत्य यह नहीं कोई नई कहानी
आपतग्रस्त भक्त जब होता जाते खुद अन्तर्यामी

भेद-भाव से परे पुजारी मानवता के थे साई
जितने प्यारे हिन्दु-मुस्लिम उतने ही थे सिक्ख ईसाई
भेद-भाव मन्दिर-मस्जिद का तोड़-फोड़ बाबा ने डाला
राम रहीम सभी उनके थे कृष्ण करीम अल्लाताला
घण्टे की प्रतिध्वनि से गूंजा मस्जिद का कोना-कोना
मिले परस्पर हिन्दु-मुस्लिम प्यार बढ़ा दिन-दिन दूना
चमत्कार था कितना सुन्दर परिचय इस काया ने दी
और नीम कडवाहट में भी मिठास बाबा ने भर दी
सब को स्नेह दिया साई ने सबको संतुल प्यार किया
जो कुछ जिसने भी चाहा बाबा ने उसको वही दिया
ऐसे स्नेहशील भाजन का नाम सदा जो जपा करे
पर्वत जैसा दुःख ना क्यों हो पलभर में वह दूर टरे
साई जैसा दाता हमने अरे नहीं देखा कोई
जिसके केवल दर्शन से ही सारी विपदा दूर गई
तन में साई मन में साई साई-साई भजा करो
अपने तन की सुदी-बुध खोकर सुधि उसकी तुम किया करो
जब तू अपनी सुदिया तज बाबा की सुध किया करेगा
और रात-दिन बाबा-बाबा ही तू रटा करेगा
बाबा ही तू रटा करेगा..बाबा ही तू रटा करेगा..

तो बाबा को अरे विवश हो सुधि तेरी लेनी ही होगी
तेरी हर इच्छा बाबा को पूरी ही करनी होगी
जंगल जगंल भटक ना पागल और ढूंढ़ने बाबा को
एक जगह केवल शिरडी में तू पाएगा बाबा को
धन्य जगत में प्राणी है वह जिसने बाबा को पाया
दुःख में सुख में प्रहर आठ हो साई का ही गुण गाया
गिरे संकटों के पर्वत चाहे बिजली ही टूट पड़े
साई का ले नाम सदा तुम सन्मुख सब के रहो अड़े
इस बूढ़े की सुन करामत तुम हो जाओगे हैरान
दंग रेह गए सुनकर जिसको जाने कितने चतुर सुजान

एक बार शिरडी में साधु ढ़ोंगी था कोई आया
भोली-भाली नगर-निवासी जनता को था भरमाया
जड़ी-बूटियां उन्हें दिखाकर करने लगा वहाँ भाषण
केहने लगा सुनो श्रोतागण घर मेरा है वृन्दावन
औषधि मेरे पास एक है और अजब इसमें शक्ति
इसके सेवन करने से ही हो जाती दुःख से मुक्ति
अगर मुक्त होना चाहो तुम संकट से बीमारी से
तो है मेरा नम्र निवेदन हर नर से हर नारी से
लो खरीद तुम इसको इसकी सेवन विधियां हैं न्यारी
यद्यपि तुच्छ वस्तु है यह गुण उसके हैं अतिशय भारी
जो है संतति हीन यहां यदि मेरी औषधि को खाए
पुत्र-रत्न हो प्राप्त अरे वह मुंह मांगा फल पाए
औषधि मेरी जो ना खरीदे जीवन भर पछताएगा
मुझ जैसा प्राणी शायद ही अरे यहां आ पाएगा
दुनिया दो दिनों का मेला है मौज शौक तुम भी कर लो
अगर इससे मिलता है सब कुछ तुम भी इसको ले लो
हैरानी बढ़ती जनता की देख इसकी कारस्तानी
प्रमुदित वह भी मन- ही-मन था देख लोगों की नादानी
खबर सुनाने बाबा को यह गया दौड़कर सेवक एक
सुनकर भृकुटी तनी और विस्मरण हो गया सभी विवेक

हुक्म दिया सेवक को सत्वर पकड़ दुष्ट को लाओ
या शिरडी की सीमा से है कपटी को दूर भगाओ
मेरे रहते भोली-भाली शिरडी की जनता को
कौन नीच ऐसा जो साहस करता है छलने को
पलभर में ऐसे ढोंगी कपटी नीच लुटेरे को
महानाश के महागर्त में पहुँचा दूँ जीवन भर को
तनिक मिला आभास मदारी क्रूर कुटिल अन्यायी को
काल नाचता है अब सिर पर गुस्सा आया साई को
पलभर में सब खेल बंद कर भागा सिर पर रखकर पैर
सोच रहा था मन ही मन भगवान नहीं है क्या अब खैर
सच है साई जैसा दानी मिल ना सकेगा जग में
अंश ईश का साई बाबा उन्हें न कुछ भी मुश्किल जग में
स्नेह शील सौजन्य आदि का आभूषण धारण कर
बढ़ता इस दुनिया में जो भी मानव सेवा के पथ पर
वही जीत लेता है जगती के जन जन का अन्तःस्थल
उसकी एक उदासी ही जग को कर देती है विह्वल
जब-जब जग में भार पाप का बढ़-बढ़ हो जाता है
उसे मिटाने की ही खातिर अवतारी ही आता है
पाप और अन्याय सभी कुछ इस जगती का हर के
दूर भगा देता दुनिया के दानव को क्षण भर के
स्नेह सुधा की धार बरसने लगती है इस दुनिया में
गले परस्पर मिलने लगते हैं जन-जन है आपस में
ऐसे अवतारी साई मृत्युलोक में आकर
समता का यह पाठ पढ़ाया सबको अपना आप मिटाकर

नाम द्वारका मस्जिद का रखा शिरडी में साई ने
दाप ताप संताप मिटाया जो कुछ आया साई ने
सदा याद में मस्त राम की बैठे रहते थे साई
प्रेहर आठ ही राम नाम को भजते रहते थे साई
रूखी सूखी ताजी बासी चाहे या होवे पकवान
सदा प्यार के भूखे साई की खातिर थे सभी समान
स्नेह और श्रद्धा से अपनी जन जो कुछ दे जाते थे
बड़े चाव से उस भोजन को बाबा पावन करते थे
कभी-कभी मन बहलाने को बाबा बाग में जाते थे
प्रमुदित मन में निरख प्रकृति छटा को वो होते थे
रंग-बिरंगे पुष्प बाग के मंद-मंद हिल-डुल करके
बीहड़ वीराने मन में भी स्नेह सलिल भर जाते थे
ऐसी समुधुर बेला में भी दुख आपात विपदा के मारे
अपने मन की व्यथा सुनाने जन रहते बाबा को घेरे
सुनकर जिनकी करूणकथा को नयन कमल भर आते थे

दे विभूति हर व्यथा शांति उनके उर में भर देते थे
जाने क्या अद्भुत शक्ति उस विभूति में होती थी
जो धारण करते मस्तक पर दुःख सारा हर लेती थी
धन्य मनुज वे साक्षात् दर्शन जो बाबा साई के पाए
धन्य कमल कर उनके जिनसे चरण-कमल वे परसाए
काश निर्भय तुमको भी साक्षात् साई मिल जाता
वर्षों से उजड़ा चमन अपना फिर से आज खिल जाता
गर पकड़ता मैं चरण श्री के नहीं छोड़ता उम्रभर
गर पकड़ता मैं चरण श्री के नहीं छोड़ता उम्रभर
मना लेता मैं जरूर उनको गर रूठते साई मुझ पर
गर रूठते साई मुझ पर..गर रूठते साई मुझ पर..

बोलो श्री सद्गुरु साईनाथ महाराज की जय.

Anant koti brahmand nayak rajadhiraj
Yogiraj parbrahm shree sachchidananda
Sadguru sainath maharaj ki jai

Pehle sai ke charano mein apna shish namau mein
Pehle sai ke charano mein apna shish namau mein
Kaise shirdi sai aaye sara haal sunau mein
Kaun he mata pita kaun he yah na kisi ne bhi jana
Kaha janam sai ne dhara prashn paheli raha bana
Koi kahe ayodhya ke ye ramchandra bhagavan hai
Koi kehta saibaba pavan-putra hanuman hai
Pavan-putra hanuman hai

Koi kehta mangal murti shri gajanan hai sai
Shri gajanan hai sai..shri gajanan hai sai..
Koi kehta gokul-mohan devaki nandan hai sai
Devaki nandan hai sai
Shankar samjh bhagat kayi to baba ko bhajte rehte
Baba ko bhajte rehte..baba ko bhajte rehte..
Koi keh avatar datt ka puja sai ki karte
Puja sai ki karte
Kuch bhi mano unko tum par sai hai sache bhagvan
Bade dayalu denbandhu kitano ko diya hai jivan daan
Kitano ko diya hai jivan daan

Kai varsh pehle ki ghatna tumhe sunaunga mein baat
Kisi bhagyashali ki shirdi mein aai thi baraat
Aaya saath usi ke tha balak ek bahut sundar
Aaya aakar wahi bas gaya paavan shirdi kiya nagar
Paavan shirdi kiya nagar

Kai dino tak raha bhatkata bhiksha maangi usne dar-dar
Aur dikhai aisi leela jag me jo ho gayi amar
Jag me jo ho gayi amar
Jaise-jaise umar badhi badhati hi vaise gayi shaan
Ghar-ghar hone laga nagar me sai baba ka gungaan
Sai baba ka gungaan
Dig-digant me laga gunjane phir to sai ji ka naam
Deen-dukhi ki rakhsha karna yahi raha baba ka kaam
Yahi raha baba ka kaam
Baba ke charno me jakar jo kahta mein hu nirdhan
Daya usi par hoti unki khul jate dukh ke bandhan
Khul jate dukh ke bandhan

Kabhi kisi ne maangi bhiksha do baba mujh ko santaan
Evam astu kehakar sai dete the usko vardaan
Dete the usko vardaan
Svayam dukhi baba ho jaate deen-dukhijan ka lakh haal
Antahkaran shri sai ka sagar jaisa raha vishal
Sagar jaisa raha vishal

Bhakt ek madraasi aaya ghar ka bahut bada dhanvan
Maal khajana behad uska keval nahi rahi santaan
Laga manane sai naath ko baba mujh par daya karo
Jhanjha se jhankrit naiya ko tum hi mera paar karo
Kuldeepak ke bina andhera chhaya hua hai ghar mein mere
Is liye aaya hun baba ho kar sarnagat tore

Kuldeepak ke abhaav mein vyarth hai daulat ki maaya
Aaj bhikhari ban kar baba sharan tumhari main aaya
De do mujhko putar daan mein rini rahunga jivan bhar
Aur kisi ka aas na mujhko sirf bharosa hai tum par
Anunae-vinae bahut ki usne charno mein dharke shish
Tab parsan hokar baba ne diya bhagat ko yah aashish

‘alla bhala karega tera’ putra janam ho tere ghar
Krapa rahegi tum par meri aur tere us baalak par
Aur tere us baalak par

Ab tak nahi kisi ne paaya sai ki kripa ka paar
Putra ratan de madrasi ko dhany kiya uska sansaar
Tan-man se jo bhaje usi ka jag mein hota hai uddhar
Sach ko aanch nahi hai koi sada jhooth ki hoti haar
Mein hu sada sahaare uske sada rahunga usaka daas
Sai jaisa prabhu mila hai itni hi kam hai kya aas

Mera bhi din tha ek aisa milti nahi mujhe bhi roti
Tan par kapda dur raha tha shesh rahi nanhi si langoti
Sarita sammukh hone par bhi mein pyaasa ka pyaasa tha
Durdin mera mere upar daavagni barasata tha
Dharti ke atirikt jagat mein mera kuch avalamb na tha
Bana bhikhaari main duniya mein dar-dar thokar khata tha

Aise me ek mitar mila jo param bhagat sai ka tha
Janjalo se mukt magar is jagati mein mujh jaisa tha
Baba ke darshan ki khaatir mil kar dono ne kiya vichaar
Sai jaise dayamurti ke darshan ko ho gaye taiyar
Paavan shirdi nagari mein jakar dekhi matvali murti
Dhane janam ho gaya ki hamne jab dekhi sai ki surat
Jab se kiye hai darshan hamne dukh saara kafur ho gaya
Sankat sare mite aur vipadao ka ant ho gaya
Maan aur samman mila bhiksha mein hamko baba se
Pratibimbit ho uthe jagat mein hum sai ki abhe se
Baba ne sammaan diya hai maan diya is jivan mein
Isaka hi sambal le main hansata jaaunga jivan mein
Hansata jaaunga jivan mein

Sai ki leela ka mere man par aisa asar hua
Lagta jagati ke kan-kan mein jaise ho woh bhara hua
Lagta jagati ke kan-kan mein jaise ho woh bhara hua
Kashiram baba ka bhagat is shirdi me rehata tha
Mein sai ka sai mera vah duniya se kahata tha
Sikar svayam vastra bechta gram nagar baajaro mein
Jhankrit usaki hrid tantri thi sai ki jhankaro se
Stabdh nisha thi the soye rajani aanchal mein chand –sitare
Nahi sujhata raha hath ko haath timir ke mare
Vastra bechkar laut raha tha hay haat se kashi
Vichitra bada sanyog ki us din aata tha woh ekaaki
Gher raah me khade ho gaye use kutil anyaayi
Maro kato luto iski hi dhvani padi sunai
Loot piit kar use vahan se kutil ho gaye champat
Aaghato se marmahat ho usne di sangya akho
Bahut der tak pada reha vah vahi usi haalat mein
Jaane kab kuch hosh ho utha usko kisi palak mein
Anjane hi uske muh se nikal pada tha sai
Jiski pratidhvani shirdi me baba ko padi sunaai

Kshubdh utha ho manas unka baba gaye vikal ho
Lagta jaise ghatna sari ghati unhi ke sammukh ho
Unmadi se idhar-udhar tab baba lage bhatakane
Sammukh chije jo bhi aai unko lage patkane
Aur dhadhkate angaro mein baba ne kar dala
Huye sashankit sabhi vaha lakh tandav nritya nirala

Samjh gye sab log ki koi bhagat pada sankat mein
Kshubhit khade the sabhi wahan par pade huye vismae me
Use bachane ke hi khatir baba aaj vikal hai
Uski hi piida se piidit unka antahsthal hai
Itne mein hi vidhi ne apni vichitrata dikhlai
Dekhkh kar jisko janta ki shradha sarita lahrai
Shradha sarita lahrai

Lekar sangyahin bhagat ko gadi ek wahan aai
Samukh apne dekh bhagat ko sai ki aankhe bhar aai
Shant dhir gambhir sindhu sa baba ka antahsthal
Aaj na jane kyun reh-reh kar ho jata tha chanchal
Aaj daya ki murti svayam tha bana hua upachari
Aur bhagat ke liye aaj tha dev bana pratihari
Aaj bhakt ki visham pariksha me safal hua tha kashi
Uske hi darshan ke khatir the umade nagar-nivasi
Jab bhi aur jaha bhi koi bhagat pade sankat mein
Uski rakhsha karne baba jate hai palbhar mein
Yug-yug ka hai sathi yah nahi koi nai kahani
Aapatgrast bhagat jab hota aate khud antaryami

Bhed-bhav se pare pujaari manavata ke the sai
Jitne pyare hindu-muslim utne hi the sikh isai
Bhed-bhav mandir-masjid ka tod-phod baba ne dala
Ram-rahim sabhi unke the krishna-karim-allatala
Ghante ki pratidvani se gunja masjid ka konaa-konaa
Mile paraspar hindu-muslim pyaar badha din-duna
Chamatkar tha kitna sundar parichae is kaya ne di
Aur neem kadvahat mein bhi mithas baba ne bhar di
Sabko sneh diya sai ne sabko santul pyar diya
Jo kuch jisne bhi chaha baba ne unko wahi diya
Aise sneh shil bhajan ka naam sada jo japa kare
Parvat jaisa dukh na kyu ho palbhar mein wah dur tare
Sai jaisa data hamne are nahi dekha koi
Jiske keval darshan se hi saari vipada dur ho gayi
Tan mein sai man mein sai sai-sai bhaja karo
Apne tan ki sudhi-budhi khokar sudhi uski tum kiya karo
Jab tu apni sudhi taj kar baba ki sudhi kiya karega
Aur raat-din baba baba hi tu rata karega
Baba hi tu rata karega..baba hi tu rata karega..

To baba ko are vivash ho sudhi teri leni hi hogi
Teri har ichchha baba ko puri hi karni hogi
Jangal-jangal bhatak na pagal aur dhundhane babako
Ek jagah keval shirdi mein tu payega baba ko
Dhane jagat mein prani hai wah jisne baba ko paya
Dukh mein sukh mein parhar aath ho sai ka hi gun gaya
Gire sankato ke parvat chahe bijali hi toot pade
Sai ka le naam sada tum sammukh sab ke raho ade
Is budhe ki sun karamat tum ho jaoge hairan
Dang rah gaye sunkar jisko jane kitane chatur sujan

Ek baar shirdi mein saadhu dhongi tha koi aaya
Bholi-bhali nagar-nivasi janta ko tha bharmaya
Jadi-butiya unhe dikhakar karne laga wahan bhashan
Kahne laga suno shrotagan ghar mera hai vrindavan
Aushadhi mere paas ek hai aur jab isme shakti
Iske sevan karne se hi ho jaati dukh se mukti
Agar mukt hona chaho tum sankat se bimari se
To hai mera namr nivedan har nar se har nari se
Lo kharid tum isko iski sevan vidhiyaa hai nyari
Yadyapi tuchch vastu hai yah gun uske hai atishay bhari
Jo hai santati heen yaha yadi meri aushadhi ko khaye
Putar-ratn ho prapt are vah muh manga phal paye
Aushadhi meri jo ann kharide jivan bhar pachtayega
Mujh jaisa prani shayad hi are yaha aa payega
Duniya do din ka mela hai mauj shauk tum bhi kar lo
Gar isse milta hai sab kuch tum bhi isko lelo
Hairani badhati janta ki lakh iski karastani
Pramudit vah bhi man hi man tha lakh logo ki naadani
Khabar sunane baba ko yah gaya daudkar sevak ek
Sunkar bhrikuti tani aur vismaran ho gaya sabhi-vivek

Hukam diya sevak ko satvar pakad dushat ko lao
Ya shirdi ki sima se hi kapti ko dur bhagavo
Mere rahte bholi-bhali shirdi ki janta ko
Kaun nich aisa jo sahas karta hai chalane ko
Pal bhar mein hi aise dhongi kapati niich lutere ko
Mahanash ke mahagart mein pahuncha du jivan bhar ko
Tanik mila aabhas madari krur kutil anyayi ko
Kaal nachta hai ab sir par gussa aaya sai ko
Palbhar mein sab khel band kar bhaga sir par rakhkar pair
Sochta tha man hi man bhagvan nahi hai kya ab khair
Sach hai sai jaisa daani mil na sakega jag mein
Ansh ish ka saibaba unhe na kuchh bhi mushkil jag mein
Sneh shil saujany aadi ka aabhushan dharan kar
Badhata is duniya mein jo bhi manav-seva ke path par
Wahi jit leta hai jagati ke jan-jan ka antahsthal
Uski ek udasi hi jag ko kar deti hai vihval
Jab-jab jag mein bhaar paap ka badh badh hi jata hai
Use mitane ke hi khaatir avatari ho aata hai
Paap aur anyae sabhi kuch is jagti ka har ke
Dur bhaga deta duniya ke danav ko kshan bhar mein
Sneh sudha ki dhaar barsane lagati hai is duniya mein
Gale paraspar milne lagte hai jan-jan aapas mein
Aise hi avatari sai mrityulok mein aakar
Samta ka yah paath padhaaya sabko apna aap mitakar

Naam dwarka masjid ka rakkha shirdi mein sai ne
Daap taap santaap mitaya jo kuchh aaya sai ne
Sada yaad mein mast ram ki baithe rehte the sai
Preher aath hi ram naam ka bhajate rehate the sai
Rukhi sukhi taaji-baasi chahe ya hove pakvaan
Sada pyaar ke bhukhe sai ki khatir the sabhi saman
Sneh aur shradha se apne jan jo kuch de jate the
Bade chaav se us bhojan ko baba paavan karte the
Kabhi-kabhi man bahlane ko baba bag mein jate the
Pramudit man nirakh prakriti chhata ko ve hote the
Rang-birange pushap bag ke mand-mand hil-dul karake
Bihad viraane man mein bhi sneh salil bhar jaate the
Aisi sumadhur bela mein bhi dukh aapaat vipada ke mare
Apne man ki vyatha sunaane jan rahte baba ko ghere
Sunakar jinki karun katha ko nayan kamal bhar aate the

De vibhuti har vyatha shanti unke ur mein bhar dete the
Jane kya adbhut shakati us vibhuti mein hoti thi
Jo dhaaran karte mastak par dukh saara har leti thi
Dhane manuj ve saakshaat darshan jo baba sai ke paaye
Dhany kamal kar unke jinse charan-kamal ve parsaye
Kash nirbhay tumko bhi sakshaat sai mil jaata
Barso se ujada chaman apna phir se aaj khil jata
Gar pakdata mein charan shri ke nahi chhodata umrabhar
Gar pakdata mein charan shri ke nahi chhodata umrabhar
Mana leta mein jarur unko gar ruthte sai mujh par
Gar ruthte sai mujh par..gar ruthte sai mujh par..

Bolo shree sadguru sainath maharaj ki jai.

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